Sunday, February 6, 2011

जुबान पर नहीं, करें कागजों पर भरोसा-प्रॉपर्टी-बिज़नस-Navbharat Times

जुबान पर नहीं, करें कागजों पर भरोसा-प्रॉपर्टी-बिज़नस-Navbharat Times


आज के दौर में जब भाई भाई को धोखा देने से बाज नहीं आता है, तो अनजान की क्या कहें! अगर आपको कोई प्रॉपर्टी पसंद आ गई है और आप उसके लिए बयाना भी दे चुके हैं, तो रजिस्ट्री से पहले एग्रीमेंट टू सेल तैयार कराने की सावधानी जरूर बरतें।

अगर आप प्रॉपर्टी बेचने का फैसला कर चुके हैं या फिर खुद कोई प्रॉपर्टी खरीदने जा रहे हैं, तो केवल जुबानी वादे पर ही भरोसा न करें। भले ही दूसरी पार्टी आपकी कितनी ही नजदीकी क्यों न हो! डील फाइनल होते ही सेल डीड तैयार नहीं की जा सकती, लेकिन इससे पहले डील को कानूनी रूप देने के लिए एक अन्य कागजात का सहारा लिया जा सकता है। वह है, एग्रीमेंट टु सेल।

वास्तव में, सेल डीड भी एग्रीमेंट टू सेल की शर्तों के आधार पर ही तैयार की जाती है। यह एग्रीमेंट बॉयर और सेलर के बीच नॉन जूडीशियल स्टाम्प पेपर पर तैयार किया जाता है। यह प्रमाण के रूप में कानूनन मान्य होता है। यह एग्रीमेंट ही कन्वेंस डीड तैयार करने का आधार बनता है।

सेल डीड
'सेल डीड' तैयार करते समय 'एग्रीमेंट टू सेल' का महत्व सामने आता है। एग्रीमेंट में लिखी शर्तों के आधार पर ही सेल डीड तैयार की जाती है। इस प्रकार तैयार सेल डीड बायर और सेलर के बीच साइन की जाती है। इसे रजिस्ट्रार के ऑफिस में रजिस्टर कराना जरूरी होता है। 'सेल डीड' ऐसा लिखित दस्तावेज होता है, जो प्रॉपर्टी के मालिकाना हक के बारे में जानकारी देता है। अगर प्रॉपर्टी के एक से ज्यादा मालिक रहे हैं, तो इसका उल्लेख भी सेल डीड में किया जाता है। साथ ही, डील की कुल कीमत, एडवांस्ड और बैलेंस्ड अमाउंट की जानकारी भी दी जाती है।

सेल डीड के माध्यम से ही पुराना मालिक प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक छोड़ने की घोषणा करता है और यह भी बताता है कि प्रॉपर्टी पर किसी किस्म का कोई बकाया नहीं है। दोनों पार्टियों के लिए सेल डीड में लिखी गई शर्तों को मानना कानूनन जरूरी होता है। इससे पहले लिखे गए एग्रीमेंट टू सेल में वे शर्तें लिखी होती हैं, जिनके आधार पर दोनों पार्टियां प्रॉपर्टी की डील करना चाहती हैं। ऐसे में एग्रीमेंट टू सेल तैयार करने से सेल डीड के समय या बाद में कभी भी किसी विवाद से बचा जा सकता है।

क्या लिखें एग्रीमेंट टु सेल में
- दोनों पार्टियों के नाम, स्थायी पते और उम्र
- एग्रीमेंट तैयार करने का दिन, दिनांक और जगह
- दोनों पार्टियों के अधिकार और जिम्मेदारियां
- उन कागजात का संक्षिप्त ब्योरा , जिनके आधार पर सेलर ने प्रॉपर्टी हासिल की थी
- प्रॉपर्टी का सही ब्योरा , जैसे - जगह , साइज , कंस्ट्रक्शन डिटेल आदि
- सेल की कुल रकम का ब्योरा
- पेमेंट का माध्यम और समय
- विभिन्न जिम्मेदारियों , जैसे - अगला पेमेंट , फाइनल डीड आदि के लिए निश्चित समय सीमा
- ट्रांसेक्शन में होने वाले खर्च की जिम्मेदारी किस पार्टी की होगी
- किसी भी पार्टी द्वारा एग्रीमेंट की कोई भी शर्त नहीं मानने पर लगने वाली पेनल्टी
- पजेशन के लिए शर्तें
- सेलर द्वारा यह घोषणा कि उक्त प्रॉपर्टी पर किसी प्रकार का कोई बकाया नहीं है
- गवाहों के नाम , साइन और पते

प्रॉपर्टी खरीदते समय कागजात की बात-प्रॉपर्टी-बिज़नस-Navbharat Times

प्रॉपर्टी खरीदते समय कागजात की बात-प्रॉपर्टी-बिज़नस-Navbharat Times



प्रॉपर्टी की खरीदारी से जुड़े कई कागजों का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है। इस बारे में दिशा-निर्देश देने के लिए 'इंडियन रजिस्ट्रेशन एक्ट 1902' बनाया गया है। इसमें स्पष्ट है कि किन कागजात को रजिस्टर्ड कराना जरूरी है और किन्हें नहीं। इस ऐक्ट के अलावा कुछ कागजात का रजिस्ट्रेशन 'दि ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी ऐक्ट 1882' के अनुसार भी किया जाता है।

- ' इंडियन रजिस्ट्रेशन एक्ट 1902' के सेक्शन 17 के अनुसार हर मूल्य की प्रॉपर्टी की गिफ्ट डीड रजिस्टर्ड कराना जरूरी है।

- इसी सेक्शन के अनुसार, गैर-वसीयत वाले ऐसे कागजात भी रजिस्टर्ड होने चाहिए, जिनसे अचल संपत्ति में अधिकार, दावा या रुचि साबित हो, इनका हनन हो या इनके संबंध में किसी लेनदेन के बारे में बताया जाए।

- ज्यादातर मॉर्गेज डीड को भी रजिस्टर्ड कराना जरूरी होता है।

- 100 रुपये से कम कीमत में प्रॉपर्टी बेचने पर सेल डीड को रजिस्टर्ड कराने से छूट दी गई है। वास्तव में, यह संभव नहीं होता।

- एक साल से ज्यादा समय की लीज या सालाना किराया तय करने पर इसके कागजात रजिस्टर्ड कराने की बाध्यता है। सालाना किराया तय करने से मतलब जब पूरे साल के लिए किराया तो तय हो जाए, लेकिन लीज का समय निर्धारित न हो।

- ' ईयर टू ईयर' लीज डॉक्यूमेंट के रजिस्ट्रेशन से यह मतलब है कि लीज खुद-ब-खुद एक से अगले साल में प्रवेश कर जाएगी। इस स्थिति में मकान मालिक के पास यह अधिकार नहीं होता कि साल के अंत में बिना नोटिस दिए लीज खत्म कर सके। अगर वह मकान पर फिर अपना कब्जा चाहता है, तो इसके लिए उसे किराएदार को लीज खत्म करने का नोटिस देना होगा। इस तरह के रजिस्ट्रेशन में जरूरी है कि लीज का समय एक साल से ज्यादा हो। यानी अगर कोई लीज एक साल से ज्यादा समय के लिए कराई जाए, तो इसे बाकायदा रजिस्टर्ड कराना जरूरी है।

- ' इंडियन रजिस्ट्रेशन एक्ट 1902' के सेक्शन 49 के अनुसार, रजिस्ट्रेशन के लिए जरूरी कागजात में से अगर किसी को रजिस्टर्ड नहीं कराया जाता है, तो उससे जुड़ी डील कानूनन मान्य नहीं होगी।

- ' दि ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी ऐक्ट 1882' के सेक्शन 53 ए के अनुसार दि स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट के अंतर्गत बताए गए खास मामलों में गैर पंजीकृत कागजात को भी सुबूत माना जा सकता है

सोसायटी में प्रॉपर्टी का ट्रांसफर-प्रॉपर्टी-बिज़नस-Navbharat Times

सोसायटी में प्रॉपर्टी का ट्रांसफर-प्रॉपर्टी-बिज़नस-Navbharat Times


हाउसिंग सोसायटी के फ्लैट्स आमतौर पर बेचे नहीं जा सकते, इसके सदस्य अपना शेयर यानी अपार्टमेंट किसी और व्यक्ति के नाम पर ट्रांसफर अवश्य कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में किन शर्तों और नियमों को ध्यान रखने की जरूरत होगी, इस पर डालते हैं एक नजर :

हाउसिंग सोसायटी के सदस्यों को यह अधिकार होता है कि वे अपना अपार्टमेंट किसी और के नाम ट्रांसफर कर सकें, लेकिन ऐसा करते समय उन्हें सोसायटी द्वारा तय नियम-शर्तों को मानना जरूरी होगा।

यदि कोई सदस्य अपना शेयर और कैपिटल या सोसायटी की प्रॉपर्टी में इंटरेस्ट ट्रांसफर करना चाहता है, तो उसे ऐसा करने से पहले निर्धारित फॉर्म द्वारा सोसायटी के सेक्रेटरी को इसके बारे में सूचित करना होगा। साथ ही, जिसके नाम पर प्रॉप्रटी ट्रांसफर की जानी है, उसकी स्वीकृति भी लिखित में देनी चाहिए। नोटिस पीरियड सोसायटी के नियम-शर्तों के अनुरूप होता है, जो 15-30 दिनों के बीच कुछ भी हो सकता है। नोटिस मिलने के बाद सेक्रेटरी उसे अगली मीटिंग में कमिटी के सामने पेश करता है, जहां इस पर विचार किया जाता है कि नोटिस देने वाले सदस्य के पास प्राइमा फेसिया (प्रथम दृष्टया) के तौर पर प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने का अधिकार है भी या नहीं। कमिटी का जो भी फैसला होगा, उसके बारे में सेक्रेटरी को तीन दिन के भीतर उस सदस्य को सूचित करना होता है।

प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने का तरीका
- सोसाइटी मेंबर को अपने शेयर, कैपिटल व सोसायटी की प्रॉपर्टी में इंटरेस्ट ट्रांसफर करने के लिए शेयर सटिर्फिकेट्स के साथ एक निर्धारित फॉर्म में ऐप्लिकेशन जमा करनी होगी।

- जिसके नाम पर प्रॉपर्टी का ट्रांसफर किया जाना है, सोसायटी में उसकी सदस्यता के लिए एक फॉर्म में ऐप्लिकेशन देनी होगी।

- प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने के पीछे क्या ठोस कारण हैं, बताना होगा।

- ट्रांसफर से पहले सोसायटी के प्रति अपनी जिम्मेदारियां पूरी करनी होंगी।

- ट्रांसफर फीस अदा करनी होगी।

- जिस व्यक्ति को मेंबरशिप ट्रांसफर की जानी है, उसकी फीस भी देनी होगी।

- जनरल बॉडी मीटिंग में तय रेट पर प्रीमियम की राशि अदा करनी होगी (यदि ट्रांसफर परिवार के किसी सदस्य, नॉमिनी या फिर उसके लीगल रिप्रजेंटेटिव के नाम किया जा रहा है, तो उस स्थिति में यह शर्त लागू नहीं होती)।

- यदि आवश्यकता हो, तो 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (एनओसी) जमा करना होगा।

मैनेजिंग कमिटी या जनरल बॉडी सदस्यता का आवेदन या शेयर और कैपिटल या सोसायटी की प्रॉपर्टी में इंटरेस्ट ट्रांसफर का प्रस्ताव एक ही सूरत में इनकार कर सकती है

-यदि कानून के प्रावधानों या सोसायटी के नियमों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया हो या फिर इस संबंध में सरकारी निर्देशों की अवहेलना हो रही हो।

- यदि सदस्य को अपनी ऐप्लिकेशन पर तीन महीने तक कमिटी या जनरल बॉडी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो उस हालत में ऐप्लिकेशन को स्वीकृत मान लिया जाएगा।

- यदि कानून या सोसायटी के नियम-शर्तों की अवहेलना करके कोई ट्रांसफर किया जाता है, तो उसे रद्द करार दिया जाएगा।

जोइंट फॅमिली प्रोपर्टी का बंटवारा


सोसाइटी में common चीज़ों की maintenance


All about Reverse Mortgage



All about reverse mortgage - Rediff.com Business


In 2007, the finance minister of India introduced a concept well-known and widely accepted in the West: Reverse Mortgage.


Reverse Mortgage: What is it?

A reverse mortgage (or lifetime mortgage) is a loan available to senior citizens. Reverse mortgage, as its name suggests, is exactly opposite of a typical mortgage, such as a home loan.

How does it work?

In a typical mortgage, you borrow money in lump sum right at the beginning and then pay it back over a period of time using Equated Monthly Instalments (EMIs).

In reverse mortgage, you pledge a property you already own (with no existing loan outstanding against it). The bank, in turn, gives you a series of cash-flows for a fixed tenure. These can be thought of as reverse EMIs.

The specific format National Housing Board (the facilitator for housing finance in India) is promoting is one in which, the tenure is 15 years and the owner of the house and his/her spouse continue to live in the house till their death -- which can occur later than the tenure of the reverse mortgage.

Simply put, any senior citizen, opting for reverse mortgage will get annuity (the reverse EMI) from the bank for 15 years. After that, the annuity payments stop. However, they can continue to live in the house.

What are the features of this loan?

The draft guidelines of reverse mortgage in India prepared by the Reserve Bank of India [ Get Quote ] have the following features:

Any house owner over 60 years of age is eligible for a reverse mortgage.

The maximum loan is up to 60 per cent of the value of the residential property.

The maximum period of property mortgage is 15 years with a bank or HFC (housing finance company).

The borrower can opt for a monthly, quarterly, annual or lump sum payments at any point, as per his discretion.

The revaluation of the property has to be undertaken by the bank or HFC once every 5 years.

The amount received through reverse mortgage is considered as loan and not income; hence the same will not attract any tax liability.

Reverse mortgage rates can be fixed or floating and hence will vary according to market conditions depending on the interest rate regime chosen by the borrower.

How is the loan paid?

With a reverse home mortgage, no payments are made during the life of the borrower(s). Since no payments are made during the term of the reverse home mortgage loan, the loan balance rises over time.

In most areas where appreciation is good, the value of the home grows at a much faster rate than the loan balance. Therefore, the remaining equity continues to grow.

When the last borrower passes, or it is decided to sell the home and move, the loan becomes due. The ownership of the home is then passed to the estate or directed by a living will or will to the beneficiaries.

The beneficiaries now own the home and have to sell the home or pay off the loan. If the home is sold, the reverse home mortgage lender is paid off and the beneficiaries keep the remaining equity of the home.

What happens after the death of one or both of the spouses?

If one of the spouses dies, the other can still continue living in the house. If both die, the bank will give their heirs two options -- settle the overall outstanding loan and retain the house, or the bank will sell the house, use the proceeds to settle the outstanding loan and give the rest to the heirs.

How much of an annuity income can my house generate using reverse mortgage?

The banks have so far not indicated the interest rates. However, we can safely assume that it will not exceed the interest rates used for loan against property -- which is currently in the region of 12 per cent to 14 per cent.

What is a loan to value ratio?

Loan to value ratio means the percentage of loan that you will get for the value of the property that you pledge. The typical rate loan to value ratio is 60 per cent.

So, for e.g., if you pledge a property worth Rs 60 lakh (Rs 6 million), then the loan amount that you can get is Rs 36 lakh (Rs 3.6 million).

Does a person's age affect the amount of annuity paid?

It certainly does. Higher the age, higher the annuity! Everything else remains the same.

Why is this scheme not popular?

Recent reports seem to indicate that a very small percentage of senior citizens only seem to have taken advantage of the facility since its inception. This could be perhaps because better awareness had not been created about the product.

Secondly, the Indian banking industry caps the available loan amount at Rs 50 lakh (Rs 5 million), instead of providing for an equitable percentage of the property's value, and limits the loan period to a tenure of 15 years.

The product is still evolving and may take on new dimensions depending on how the banks wish to present its consumer appeal.